लालची सारस की कहानी – Lalchi Saras Ki Kahani

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लालची सारस की कहानी - Lalchi Saras Ki Kahani
लालची सारस की कहानी – Lalchi Saras Ki Kahani

एक बूढ़ा सारस नदी किनारे रहता था। वह सारस इतना बूढ़ा हो चला था कि भरपेट भोजन जुटा पाना भी उसके लिए मुश्किल हो गया था । मछलियां अगल-बगल  से तैरकर निकल जाती, लेकिन कमजोर होने के कारण वह उन्हें पकड़ नहीं पाता था।

एक दिन वह बहुत भूखा था, क्यूंकि पिछले कुछ दिनों से उसे खाने को कुछ भी नहीं मिला था। उदास होकर वह नदी किनारे बैठ गया और रोने लगा। उस समय एक केकड़ा वहा से गुजर रहा था। उसने सारस को रोते देख कारण पूछा। तभी अचानक सारस के दिमाग में विचार आया कि वह केकड़े को बहला – फुसलाकर खा ले तो कितना मजा आए।

उसने केकड़े को कुछ देर शांत रहने को कहा ताकि वह अपनी ख़ुशी को छिपा सके। केकड़ा चुप चाप बैठ गया । इस बिच चालक सारस ने ऐसा नाटक किया मानो सच में वह दुखी हो। वह बोला, शायद तुम नहीं जानते कि इस नदी के जंतुओं पर कैसी समस्या आने वाली है, सबके सब मारे जायेंगे। नदी का पानी ख़त्म होने वाला है ।

‘ क्या ? ‘ सुनकर केकड़ा हैरान रह गया। सारस बोला, ‘ हा ‘, मुझे एक ज्योतिषी ने बताया है कि जल्द ही यह नदी सुख जाएगी और इसमें रहने वाले सभी प्राणी मारे जायेंगे। ऐसी भविस्यबाणि सुनकर तो मेरा मन कांप उठा है। फिर कुछ देर रुककर सारस ने बोला, यहां से कुछ ही दूरी पर एक झील है। बड़े जलजीब जैसे मगरमच्छ , कछुए व मेंढक आदि तो खुद ही चलकर वहां पहुंच सकते है। लेकिन मुझे मछलियों जैसे उन जीवों की चिंता सत्ता रही है, जो चलना जानते ही नहीं। बिना पानी के तो वे मर जायेंगे। यही कारण है कि में ईटा उदास व दुखी हूँ। में उनकी मदद करना चाहता हुं।

सारस की ये बाते नदी में रहने वाले सभी जीव- जंतु चुप चाप सुन रहे थे। लेकिन वे यह सोचकर खुश भी थे कि उनकी मदद के लिए सारस वहां आ चूका है। तभी सारस बोला, यहां से कुछ दूर पानी से लबालब भरी झील है। में सभी जीवों को अपनी पीठ पर बैठाकर वहां ले जाऊंगा और उन्हें सुरक्षित उस झील में छोड़ दूंगा। 

सारस के उस प्रस्ताव पर सभी जीव – जंतु खुश हुए और उन्हने हामी भर दी। उधर सारस भी अपनी योजना को पूरा करने के लिए तैयार था। पहल उसने मछलियों से कि, और उन्हें पीठ पर लादकर ले चला। लेकिन उन्हें झील तक पहुँचाने के बजाय एक पहाड़ी के पीछे ले गया और मरकर खा लिया । इस तरह से रोज़ सारस कई मछलियों को खा जाता था। कुछ ही दिनों में उसकी सेहत सुधर गई और वह हट्टा – कट्टा हो गया।

एक दिन केकड़ा सारस से बोला, ‘ दोस्त , लगता है तुम मुझे भुला चुके हो। मेरा तो विचार था कि झील तक जाने वालों में मेरा नंबर पहला होगा। लेकिन अब मुझे लगता है कि तुम्हे मेरा जरा भी ख्याल नहीं है। ‘नहीं मै तुम्हे भुला नहीं हूं’, सारस बोला। वह इसमें बदलाव चाहता था, इसलिए वह केकड़े से बोला ‘ नाराज़ मत हो दोस्त’ ! आओ मेरी पीठ पर बैठ जाओ । यह सुनते ही केकड़े सवार हो गया सारस की पीठ पर और सारस चल दिया झील की और। सारस की गतिबिधिया केकड़े को पहले दिन से ही गलत लग रही थी। और आज केकड़े को लग रहा था उसका सक बिलकुल सही था।

जब चलते हुए काफी देर हो गई तो केकड़े ने पूछा,  ‘अभी कितनी दूर है वह झील ?‘ सरस ने सोचा कि केकड़ा चुप रहने वाला सीधा – सदा जीव है और उसके इरादा को कभी जान नहीं पाएगा। कुछ देर चलने के बाद सारस गुस्से में बोला, ‘ मुर्ख ! तुम क्या समझते को कि मै तुम्हारा नौकर हूँ । यहां आसपास कोई दूसरी झील नहीं है। मेरी यह योजना तो तुम सभी को अपना आहार बनाने के लिए थी। अब तुम भी तैयार हो जाओ मरने के लिए । ‘

यह सुनकर केकड़े ने अपनी हिम्मत नहीं तोड़ी। उसने तुरंत अपने तीख पंजे सारस कि गरदन पर गढ़ा दिए और उससे नदी की और लौट चलने को कहा। उसने यह भी कहा कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो वह अपने तीखे पोजों से उसकी गरदन तोड़ देगा। अब नदी की हुए लौट चलने के अलावा सारस के पास और कोई रास्ता न था। नदी किनारे पहुँचते ही केकड़ा उछलकर सारस की पीठ से उतरा और नदी के बचे जीवो को सारस की कारस्तानी से अबगत कराया। यह सुनकर सभी को गुस्सा  आ गया और उन्हने आक्रमण कर सारस को मर डाला ।

निष्कर्ष :

इस लालची सारस की कहानी से हमें  यह सिख मिलती है कि लालच कभी नहीं करना चाहिए और कभी किसी को धोका देना बहत गलत चीज़ होता है। अपने खुसी के लिए किसी और कि जान लेना या दूसरे के साथ गलत करना बिल्कुल भी सही नहीं है । हमें हमेशा सतर्क रहना होगा सारस जैसी सच रखने वाले लोगों से ।

दोस्तों आसा करता हूँ लालची सारस की कहानी या बूढ़े सारस की कहानी अच्छा लगा होगा। ऐसे और भी कोई कहानी के लिए आप कमेंट कर सकते है। ऐसे रेगुलर पोस्ट के लिए आप हमारे साइट को रेगुलर विजिट कर सकते है । “जय हिन्द .

 

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